टिहरी सीट पर किसका चलेगा जादू ?

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ओम जोशी 

गंगा-यमुना के साथ ही उनकी सहायक नदियों के उद्गम स्थल वाली लोकसभा की टिहरी सीट का भूगोल उत्तरकाशी के नेलांग घाटी (ट्रांस हिमालय) से लेकर देहरादून के तराई तक के 14 विधानसभा क्षेत्रों में फैला है। अंतराष्ट्रीय सीमाओं से सटे इस संसदीय क्षेत्र का भूगोल तो जटिल है ही साथ ही साथ सियासी भूगोलभी खासा रोचक रहा है। टिहरी रियासत के भारत में विलय के बाद यहां की सियासत की धुरी राजशाही के ही इर्द गिर्द घूमती रही है। 10 आम चुनाव और एक उप चुनाव में टिहरी राज परिवार से ही सांसद चुने गए और सियासी दलों के लिहाज से देखें तो आठ बार आम चुनाव और एक बार उप चुनाव में यह सीट कांग्रेस के पास रही, जबकि छह बार आम चुनाव और एक उप चुनाव में भाजपा के पास। इस सीट पर एक एक बार  जनता दल और निर्दल सांसद ने भी प्रतिनिधित्व किया।

टिहरी सीट का क्षेत्र पूरब में गढ़वाल और दक्षिण में हरिद्वार लोकसभा सीट से जुड़ा है। पश्चिम में इसकी सीमा हिमाचल प्रदेश से लगी है तो उत्तर की तरफ चीन सीमा से सटे होने के कारण इस सीट का महत्व और भी बद जाता है। इसकी परिधि में आने वाले 14 विस क्षेत्रों में नौ विशुद्ध रूप से पर्वतीय और पांच तराई क्षेत्र के हैं। विश्व प्रसिद्ध गंगोत्री व यमुनोत्री धाम के साथ ही दुनिया का आठवां सबसे बड़ा टिहरी बांध भी यहीं है।

आजादी से पहले टिहरी गढ़वाल राजशाही के अधीन था। देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ, मगर टिहरी रियासत 1 अगस्त 1949 में भारत में विलय हुई। इससे राजशाही का अंत तो हुआ, मगर स्वतंत्र भारत के लोकसभा चुनाव में यहां राजशाही एक धुरी बनी रही। 1952 के पहले आम चुनाव में राज परिवार से राजमाता कमलेंदुमति शाह ने निर्दल प्रत्याशी के रूप में जीत दर्ज की। 1957 में कांग्रेस के टिकट पर कमलेंदुमति शाह के बेटे एवं टिहरी रियासत के अंतरिम शासक रहे मानवेंद्र शाह सांसद चुने गए। इसके बाद कांग्रेस के टिकट पर मानवेंद्र शाह ने 1962 व 1967 में भी लगातार जीत दर्ज की। 1971 में कांग्रेस के टिकट पर परिपूर्णानंद पैन्यूली ने पहली बार राजशाही के किले में सेंध लगाई। 1977 में पर्वतपुत्र हेमवंती नंदन बहुगुणा समर्थित जनता दल के प्रत्याशी त्रेपन सिंह नेगी विजयी रहे। 1980 में कांग्रेस के त्रेपन सिंह नेगी ने जीत दर्ज की। 1984 में कांग्रेस के टिकट पर ब्रह्मदत्त लोकसभा पहुंचे। 1989 में भी वह दोबारा जीते। 1991 में इस सीट पर पहली बार भाजपा का खाता खुला और उसके मानवेंद्र शाह चुनाव जीते। इसके बाद लगातार 1996, 1998, 1999 व 2004 में भी मानवेंद्र शाह ने भाजपा के टिकट से जीत दर्ज की। मानवेंद्र शाह के निधन के बाद 2007 में हुए उपचुनाव में कांग्रेस के विजय बहुगुणा जीते। 2009 के आम चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी विजय बहुगुणा ने मनुजेंद्र शाह को हराया। 2012 के उपचुनाव में भाजपा के टिकट पर महारानी माला राज्यलक्ष्मी शाह चुनाव जीती और 2014 में वह फिर से भाजपा के टिकट से जीतीं। उत्तरकाशी, देहरादून व टिहरी जिलों के अंतर्गत फैली इस लोकसभा सीट का सामाजिक-सांस्कृतिक तानाबाना काफी रोचक रहा है। सांस्कृतिक लिहाज से यह क्षेत्र चार हिस्सों में बंटा हुआ है। अभी भी यहां की 62 फीसद आबादी गांवों में निवास करती है, जबकि 38 फीसदी आबादी शहरी क्षेत्रों में सिमटी है । सीट के अंतर्गत अनुसूचित जाति की जनसंख्या का आंकड़ा 17.15 फीसद है, जबकि अनुसूचित जनजाति की आबादी 5.8 फीसद है।

टिहरी का चुनावी इतिहास बताता है कि यहां राजपरिवार का वर्चस्व रहा है – राज परिवार को टिकट देना जीत की गारंटीमन जाता है और यही कारण है की कांग्रेस और भाजपा इस परिवार के सदस्यों को मैदान में उतारती रही है । राज परिवार ने कांग्रेस का दामन छोड़ पहली बार 1991 में भाजपा के टिकट पर जीत हासिल की भाजपा की जीत का सिलसिला मानवेन्द्र शाह के निधन के साथ टूटा ।  इसके बाद हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने राज घराने के खिलाफ हेमंती नंदन बहुगुणा के वारिश विजय बहुगुणा को मौका दिया – विजय बहुगुणा ने 2007 के उपचुनाव में राज परिवार को मात दे दी – वर्ष 2009 के चुनाव में भाजपा ने राजपरिवार की जगह अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज जसपाल राणा को चुनाव मैदान में उतारा – लेकिन वे लक्ष्य को नहीं भेद पाए और बहुगुणा से हार गए  ।  वर्ष 2012 में विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्री बनने से खाली हुई सीट पर मुख्यमंत्री के पुत्र साकेत बहुगुणा  जब इस सीट पर चुनाव लड़े तो भाजपा को  राजपरिवार की शरण लेनी पड़ी और  राज परिवार की बहू माला राज्यलक्ष्मी शाह को मैदान में उतारा – जिसके बाद फिर भाजपा विजय हुई।

वर्ष 2014 में राज परिवार की बहू माला राज्यलक्ष्मी शाह ने पुन: साकेत बहुगुणा को हरा दिया । अब बहुगुणा परिवार के भाजपा में शामिल होने के बाद एक बार फिर पार्टी ने राज परिवार को प्राथमिकता  देते हुए माला राज्य लक्ष्मी शाह तीसरी बार चुनाव मैदान में है । लेकिन इस बार उनके सामने नया सियासी घराना है । कांग्रेस प्रत्याशी प्रीतम सिंह का परिवार 1951 से सियासत में है  पिता गुलाब सिंह मसूरी ओर चकराता से 8 बार के विधायक रहे हैं – उनके निधन के बाद प्रीतम सिंह ने उनकी विरासत को आगे बढ़ाया । प्रीतम सिंह ने पिता के इस क्षेत्र में राजनीतिक दबदबे को कमजोर नहीं पड़ने दिया – लेकिन इस बार उन्हें अपने दुर्ग से बाहर निकल कर चुनाव लड़ना है । चकराता में  भाजपा कभी बढत नहीं बना सकी है – वर्ष 2014 में जब  पूरे देश में मोदी लहर थी तब उत्तराखंड में चकराता  एकमात्र ऐसी विधानसभा थी जहां से भाजपा पिछड़ी हुई थी । आज तक अपना दुर्ग सुरक्षित रखने वाले प्रीतम सिंह के सामने सबसे बड़ी चुनौती संसदीय क्षेत्र के मैदानी हिस्से है जहां 60% मतदाता रहते हैं । साथ ही टिहरी लोकसभा सीट से गौ कथावाचक गोपालमणि महाराज भी टिहरी लोकसभा सीट से चुनाव मैदान मैं हैं और उनके चुनाव मैदान में आने से भाजपा को भी नुकसान झेलना पढ़ सकता हैं

मैदानी विधानसभाओं में विकासनगर- सहसपुर -रायपुर  – राजपुर – कैंट और मसूरी विधानसभा है जो पिछले 5 सालों में भाजपा के गढ़ के रूप में तब्दील हुई है । विधानसभा चुनाव में ये सभी सीटें भाजपा के खाते में आई- जबकि हाल ही में हुए  नगर निगम चुनाव ने साबित किया कि भाजपा की पकड़ इन विधानसभा क्षेत्रों में कमजोर नहीं हुई है  मैदान- रंवाई – जौनसार के अलावा तीसरा क्षेत्र टिहरी का है । माला राज्य लक्ष्मी शाह टिहरी राज परिवार की बहू है – यहां की हर विधानसभा टिहरी – प्रतापनगर और घनसाली में भाजपा के सिटिंग विधायक हैं – इसलिए भाजपा को इन क्षेत्रों में मनोवैज्ञानिक बढ़त मिली हुई है – यहां का चुनावी इतिहास हमेशा राजघराने के पक्ष में रहा है ।

1951 से इस संसदीय क्षेत्र में हुए 18 चुनाव में से 11 बार टिहरी राजघराने को जीत मिली  हैं

प्रीतम सिंह भले ही पहला लोकसभा चुनाव लड़ रहे हो- पर सियासत के वे मंझे हुए खिलाड़ी हैं

प्रीतम के घर में विधायक मुन्ना सिंह चौहान और उनकी पत्नी मधु चौहान के दमखम की भी परीक्षा है

 

टिहरी लोकसभा में कुल 1481194 मतदाता है

पुरुष मतदाता 7 55 603

महिला मतदाता 7 05 531

ट्रांसजेंडर 60 मतदाता है

 

—वर्तमान स्थिति—

वर्तमान में भाजपा की माला राज्यलक्ष्मी शाह इस संसदीय क्षेत्र से सांसद हैं ,  2014 में उन्होंने कांग्रेस के साकेत बहुगुणा को हराया था ।

भाजपा को इस सीट पर 57.50 फीसद वोट मिले थे जबकि कांग्रेस 32.72 फ़ीसदी मत ही हासिल कर पाई थी

 

—टिहरी लोकसभा का जातीय समीकरण—

ठाकुर वोट 45%

ब्राह्मण वोट 30%

एससी-एसटी वोट 17%

अन्य  8%

 

–विधानसभावार मतदाता–

पुरोला 69927

यमुनोत्री 71535

गंगोत्री 82961

घनसाली 92225

प्रताप नगर 81500

टिहरी 81908

धनोल्टी 79514

चकराता 102449

विकास नगर 109959

सहसपुर 158115

रायपुर 170804

राजपुर 118989

देहरादून कैंट 131269

मसूरी 130039

 

—राज्य बनने के बाद हुए चुनांव में मिला मत प्रतिशत—

वर्ष 2004 –

भाजपा को मिले 267395     47.62 %

कांग्रेस को मिले 249949     44.52 %

अन्य                  7.86%

 

–वर्ष 2009 —

कांग्रेस को मिले 263083         45.04%

भाजपा को मिले 210144         35.98%

अन्य                     18.62%

 

–वर्ष 2014 —

भाजपा को मिले  446733           57.50%

कांग्रेस को मिले   254230           32.72%

अन्य                          9.78%

 

टिहरी लोकसभा की 14 में से छ मैदानी सीटों का हार जीत में अहम् योगदान रहेगा जहाँ भाजपा   को राजपरिवार के तिलिस्म पर भरोसा है  जबकि कांग्रेस ने एक बार फिर विरासत की  सियासत पर दांव खेला है । 1951 से इस संसदीय क्षेत्र में हुए 18 चुनाव में  से 11 बार राजघराने के वारिश जीते हैं । इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए भाजपा ने दो बार से लगातार जीत रही माला राज्यलक्ष्मी शाह को चुनांव मैदान में उतारा है – वहीँ उनके सामने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह है । प्रीतम भले ही पहला लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं – लेकिन चुनावी सियासत के वो मंझे हुए खिलाड़ी हैं । चकराता विधानसभा क्षेत्र से वे लगातार 5 बार जीते है । रंवाई जौनसार क्षेत्र में उनके पिता गुलाब सिंह की मजबूत पकड़ को प्रथम सिंह ने कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया है / कोई भी सियासी लहर चली हो प्रीतम सिंह अपने दुर्ग में अजय खड़े रहे हैं – लेकिन इस बार उनके सामने दुर्ग से बाहर निकल कर जीत की पटकथा लिखने की चुनौती है

वहीँ गौ कथावाचक गोपालमणि महाराज भी इस लड़ाई को रोचक बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते क्यूंकि अब हवाओं में ये चर्चा भी बहस का मुद्दा बनी हुई है की गोपालमणि किस पार्टी के वोटरों को प्रभावित करेंगे   अब देखना होगा कि टिहरी लोकसभा सीट त्रिकोणी मुकाबले में  कौन अपना कब्जा कर पाता है..

 

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